विष्णु खरे स्मृति सम्मान : संस्तुतियाँ आमंत्रित हैं.

9/24/2020








२०२१

का

विष्णु खरे स्मृति सम्मान

 

आलोचना और अनुवाद के क्षेत्रों  (साहित्य-समालोचना, सिने-आलोचना, कविता-अनुवाद, कहानी-अनुवाद, विशिष्ट लेखों के अनुवाद) में दिए जाएंगे, जो पिछले तीन वर्षों (सन् २०१८/१९/२० तक) में  प्रकाशित  हों.

 

 

 

 

कृपया संस्तुतियाँ टिप्पणी में लिखें


 संस्तुतियों का आरूप

१. अनुशंसा की विधा : (आलोचना/ अनुवाद)

२. रचनाकार का नाम :

३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : (हाँ/नहीं)

४. रचना का नाम :

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना - पत्रिका का अंक, या वेब पत्रिका का लिंक :

६. अधिकतम एक हजार शब्दों में अनुशंसा - (सत्य, स्वातन्त्र्य, मूल्यबोध के आयामों पर रचना/आलेख/अनुवाद किस तरह खरी उतर रही है)

अधिक जानकारी के लिए समालोचन वेब पत्रिका देखें।  

प्रविष्टियाँ भेजने की अंतिम तिथि : 31 दिसम्बर २०२०

समालोचन पर संस्तुतियाँ टिप्पणी करें या ई मेल करें :

 

 

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41 comments:

अनाम at: 26 अक्तूबर 2020 को 9:15 pm ने कहा…

१. अनुशंसा की विधा : अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : कुर्रतुल-ऐन-ताहिरा/ अनुवाद और प्रस्तुति : सदफ़ नाज़

३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

४. रचना का नाम : नुक़्ता ब नुक़्ता

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : सदानीरा, वसन्त २०१८, https://www.sadaneera.com/nuqta-b-nuqta-ghazal-of-iranian-poet-qurrat-ul-ain-tahirih-in-hindi-translation-by-sadaf-naaz/

६. अनुशंसा :

यह मूल रचना प्रसिद्ध ईरानी ग़ज़ल है। ईरानी कवयित्री कुर्रतुल-ऐन-ताहिरा (1817-1852) बाबी मत से जुड़ी हुई थीं। इस्लाम से अलग मत रखने के कारण उन्हें फांसी दे दी गई थी। स्त्रियों की शिक्षा और अधिकारों के लिए वह आजीवन संघर्ष करती रहीं।

मूल रचनाकार के जीवन का संघर्ष सत्य और स्वातन्त्र्य को परिलक्षित करता है। इस ग़ज़ल के अनुवाद में सदफ़ नाज़ ने मूल फारसी पाठ के बहुत करीब लय रखने की कोशिश की है। उनका स्वातन्त्र्य हिन्दुस्तानी ज़बान को समृद्ध करने का उपक्रम है, जिसमें फारसी और उर्दू लफ्ज़ों की बहुतायत है। साथ ही यह रचना प्रेम और विरह के मूल्यों को उजागर करने में सक्षम है। इसमें तमाम रूपकों और उपमाओं का समन्वय है।

अनाम at: 26 अक्तूबर 2020 को 9:29 pm ने कहा…


१. अनुशंसा की विधा : अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : कुर्रतुल-ऐन-ताहिरा/ अनुवाद और प्रस्तुति : सदफ़ नाज़

३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

४. रचना का नाम : नुक़्ता ब नुक़्ता

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : सदानीरा, वसन्त २०१८, https://www.sadaneera.com/nuqta-b-nuqta-ghazal-of-iranian-poet-qurrat-ul-ain-tahirih-in-hindi-translation-by-sadaf-naaz/

६. अनुशंसा :

यह मूल रचना प्रसिद्ध ईरानी ग़ज़ल है। ईरानी कवयित्री कुर्रतुल-ऐन-ताहिरा (1817-1852) बाबी मत से जुड़ी हुई थीं। इस्लाम से अलग मत रखने के कारण उन्हें फांसी दे दी गई थी। स्त्रियों की शिक्षा और अधिकारों के लिए वह आजीवन संघर्ष करती रहीं।

मूल रचनाकार के जीवन का संघर्ष सत्य और स्वातन्त्र्य को परिलक्षित करता है। इस ग़ज़ल के अनुवाद में सदफ़ नाज़ ने मूल फारसी पाठ के बहुत करीब लय रखने की कोशिश की है। उनका स्वातन्त्र्य हिन्दुस्तानी ज़बान को समृद्ध करने का उपक्रम है, जिसमें फारसी और उर्दू लफ्ज़ों की बहुतायत है। साथ ही यह रचना प्रेम और विरह के मूल्यों को उजागर करने में सक्षम है। इसमें तमाम रूपकों और उपमाओं का समन्वय है।

संस्तुतिकर्ता : प्रचण्ड प्रवीर

मनीष तोमर at: 15 दिसंबर 2020 को 2:24 am ने कहा…

1.अनुशंसा की विधाः आलोचना
2.रचनाकार का नामः शीतांशु
3.रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम हैः हाँ (जन्मतिथिः 29 अप्रैल 1985)
4.रचना का नामः कंपनी राज और हिन्दी
5.रचना के प्रकाशन संबंधी सूचनाः राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018
6.अनुशंसाः
‘कंपनी राज और हिन्दी’ पुस्तक उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक पचास वर्षों के परिदृश्य पर हमारा ध्यान ले जाता है। यह एक ऐसा दौर है जिसके इतिहास पर बात करने से हमारे ज्यादातर साहित्येतिहासकार कतराते रहे हैं। इसका एक कारण सामग्री की अनुपलब्धता है और दूसरा कारण इतिहास की व्याख्याओं में आने वाली असुविधा। यह पुस्तक अभिलेखागारों का चक्कर काटने के बाद लिखी गई है और बड़ी ही बारीकी से इस दौर के बारे में दी गई विभिन्न स्थापनाओं का खंडन करती है तथा भ्रांतियों को दूर करती है।
किताब को जितना इस दौर को समझने के लिए लिखा गया है उतना ही सत्ता और ज्ञान के बारीक संबंधों की पहचान के लिए भी लिखा गया है। यह पुस्तक उन्नीसवीं सदी के इतिहास के बारे में निकाले गए सरलीकृत निष्कर्षों के कारकों की सटीक पहचान करती है। उपनिवेशवाद को देखने-समझने की हमारी दृष्टि की सीमाओं का उद्घाटन करती है। यह पुस्तक यह संप्रेषित करती है कि अतीत की समझदारी को परिपक्व किए बगैर अगर हम सार्थक और सुन्दर के विकास की ओर बढ़ने का प्रयास करेंगे तो हमेशा ही कुछ छूटता रहेगा। यह जरूरी है कि हम अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरताओं का पर्दाफाश करें लेकिन इस क्रम में अगर हमने कुछ तथ्यों को ओझल कर दिया है तो उस पर पुनर्विचार करें क्योंकि आलोचक का दायित्व सबसे पहले यथार्थ को पकड़ना है। सिर्फ अन्याय का उद्घान करना उसका दायित्व नहीं है, छद्मों और भ्रांतियों का निराकरण भी उसका दायित्व है।
सादर,
डॉ.मनीष तोमर
बागपत, उत्तर प्रदेश

मनीष तोमर at: 15 दिसंबर 2020 को 2:26 am ने कहा…


1.अनुशंसा की विधाः आलोचना
2.रचनाकार का नामः शीतांशु
3.रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम हैः हाँ (जन्मतिथिः 29 अप्रैल 1985)
4.रचना का नामः अनुवाद और विचारधारा
5.रचना के प्रकाशन संबंधी सूचनाः आलोचना पत्रिका, अंक 63 (अक्टूबर 2020) में प्रकाशित
6.अनुशंसाः
हिन्दी आलोचना के इतिहास पर नज़र डालें तो एक चीज़ बड़ी साफ दिखाई देती है कि हमारे वरिष्ठ आलोचकों की नज़र व्यापक रही है। रचना के अर्थ तक पहुँचने से पहले इन आलोचकों ने जरूरी समझा कि परंपरा का विस्तृत ज्ञान आत्मसात किया जाए, सिद्धांतों की पहचान की जाए, इतिहास-समाज और राजनीति के परिदृश्य से वाकिफ हुआ जाए और उसके बाद रचना की ओर एक सचेत पाठक और एक सहृदय के रूप में पहुँचा जाए। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य शुक्ल और रामविलासजी- इन सभी का लेखन ऐसे विषयों से अटा पड़ा है जो व्यावहारिक आलोचना में उतरने से पहले की इनकी तैयारी को दिखाते हैं। समकालीन आलोचना परिदृश्य में एक बड़ी जमात ऐसी है जो अतीत से बगैर किसी संवाद के सिद्धांतों की कोई जानकारी अर्जित किए बगैर रचना के ईर्द-गिर्द चक्कर काट रही है। इसीलिए कहानियों और कविताओं की आलोचना उतनी नहीं दिखाई देती जितनी की संदर्भ सहित व्याख्या। शीतांशुजी का यह लेख इस कमी को पूरा करता है। यह एक गंभीर शोधपूर्ण दृष्टि के साथ, ठहराव के साथ लिखा गया आलेख है जो अनुवाद और विचारधारा के संबंधों के विभिन्न परतों को उद्घाटित कर देता है। पिछले सौ वर्षों में अनुवाद विधा किस तरह विचारधारात्मक प्रक्रियाओं के (वे चाहे राजनीतिक विचारधाराएँ हों, या धार्मिक, या सांस्कृतिक) साथ किस गूढ़ता से संलग्न रही हैं इसे समझने के लिए यह लेख अत्यधिक उपयुक्त है। यह लेख जहाँ एक ओर अनुवाद की सामाजिक प्रतिष्ठा के विचारधारात्मक आयामों को उद्घाटित करता है वहीं दूसरी ओर महत्वपूर्ण कृतियों के मूल और अनुवाद के अभिग्रहण की प्रक्रिया पर विचार करते हुए समकालीन स्थितियों में उसके प्रभाव का विश्लेषण करते चलता है। अनुवाद में विचारधारा के संश्लिष्ट रूप, मूल से इसके अलगाव, इसकी संरचना और प्रभाव आदि आयामों पर भी सतर्कतापूर्वक विचार किया गया है। साथ ही राष्ट्रवाद और अंधराष्ट्रवाद के बीच के फर्क को, भाषाई साम्राज्यवादी अवस्थितियों को और उत्तर औपनिवेशिक चिन्तन की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए लेख को सैद्धांतिक धरातल पर गहरी मजबूती दी गई है।
हिन्दी आलोचना के सैद्धांतिक पक्ष को और समर्थ बनाने में इस आलेख की भूमिका महत्वपूर्ण है। शीतांशु कम लिखते हैं लेकिन उनका लिखा हुआ इस बात की तस्दीक करता है कि आलोचना हड़बड़ी की नहीं तैयारी की चीज़ है। अच्छी व्यावहारिक आलोचना में उतरने से पहले अच्छे अध्ययन और मनन की जरूरत होती है। शीतांशुजी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘कंपनी राज और हिन्दी’ 2018 में राजकमल से प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक भी इस पुरस्कार के लिए निर्धारित दायरे के भीतर है। पुस्तक उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक पचास वर्षों का गहन विश्लेषण करती है और उपनिवेशवाद को समझने में हमसे हुई चूकों का उद्घाटन करती है। निर्णायक समिति इस आलेख के अतिरिक्त उक्त पुस्तक पर भी इस सम्मान हेतु विचार कर सकती है।
आलेख संस्तुति के साथ संलग्न है।
सादर,
डॉ.मनीष तोमर
बागपत, उत्तर प्रदेश

प्रचण्ड प्रवीर at: 15 दिसंबर 2020 को 4:22 pm ने कहा…

१. अनुशंसा की विधा : अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : जॉयस मन्सूर की कविताएँ :: अनुवाद और प्रस्तुति : अखिलेश सिंह

३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

४. रचना का नाम : क्या तुम्हें उन केले के वृक्षों की मधुर सुगंध अभी तक याद है? >

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : सदानीरा , https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/

६. मूल रचना ब्रिटेन में जन्मी, मिश्र की यहूदी मूल के फ्रांस में निर्वासित कवयित्री जॉयस मन्सूर की है। इनकी रचनाओं में स्वातन्त्र्य दैहिक और कामुक अनुभूतियों को नए स्वर में अभिव्यक्त करने से है। चूँकि यह अभिव्यक्तियाँ केवल काम-तृप्ति हेतु न हो कर मानवीय सम्बन्धों की जटिलता को भी सम्बोधित करते हैं इसलिए सघन मूल्यबोध से सम्बन्धित हैं। अनुवादक ने इस भुला दी कवयित्री के पुनरुत्थान में अनुवाद के माध्यम से सत्यनिष्ठा का परिचय दिया है।

संस्तुतिकर्ता: प्रचण्ड प्रवीर

अनाम at: 18 दिसंबर 2020 को 5:40 am ने कहा…

• अनुशंसा की विधा : अनुवाद

• रचनाकार का नाम : गार्गी मिश्र

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

• रचना का नाम : आन येदरलुंड की कविताएँ

• रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : https://www.sadaneera.com/poems-of-swedish-poet-ann-jaderlund-in-hindi-translation-by-gargi-mishra/

• संस्तुतिकर्त्ता : सुघोष मिश्र

अनाम at: 18 दिसंबर 2020 को 5:42 am ने कहा…

• अनुशंसा की विधा : अनुवाद

• रचनाकार का नाम : आदित्य शुक्ल

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

• रचना का नाम : संघर्ष से कुछ उम्मीद मत करो, अगर मैं कहूं कि अब नहीं लिखूंगा, मेरी देह को भय होगा, मुझे नहीं

• रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : https://www.sadaneera.com/poems-of-chilean-poet-roberto-bolano-in-hindi-translation-by-aditya-shukla/

http://www.sadaneera.com/prose-of-spanish-novelist-translated-in-hindi-by-aditya-shukla/

https://www.sadaneera.com/quotes-of-argentine-writer-jorge-luis-borges-translated-in-hindi-aditya-shukla/

• संस्तुतिकर्त्ता : सुघोष मिश्र

अनाम at: 18 दिसंबर 2020 को 5:43 am ने कहा…

• अनुशंसा की विधा : अनुवाद

• रचनाकार का नाम : अखिलेश सिंह

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

• रचना का नाम : क्या तुम्हें उन केले के वृक्षों की मधुर सुगंध अभी तक याद है?

• रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/

• संस्तुतिकर्त्ता : सुघोष मिश्र



अनाम at: 18 दिसंबर 2020 को 5:51 am ने कहा…

• अनुशंसा की विधा : अनुवाद

• रचनाकार का नाम : भावना मिश्रा

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

• रचना का नाम : कला का एक सबक बेटे के साथ, निज़ार क़ब्बानी

• रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : http://bhavnamishra.blogspot.com/2015/04/blog-post.html?m=1

http://bhavnamishra.blogspot.com/2015/04/blog-post_29.html?m=1

• संस्तुतिकर्त्ता : सुघोष मिश्र




रामकुमार शुक्ल लखनऊ at: 19 दिसंबर 2020 को 8:40 pm ने कहा…

अनुशंसा की विधा : आलोचना

• रचनाकार का नाम : संतोष अर्श

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

युवा कवि और आलोचक संतोष अर्श ने इधर अपने सुचिंतित आलेखों से ध्यान खींचा है. उनके अधिकतर आलेख समालोचन में मैंने पढ़े हैं. उनसे बहुत संभवनाएं हैं . मैं इस सम्मान के लिए उनका नाम प्रस्तावित करता हूँ.
__
उनके लेख
१. मुद्राराक्षस के नरक की नियतिहीनता : नारकीय :
https://samalochan.blogspot.com/2019/05/blog-post_15.html

२.'स्तन’ और ‘ब्रेस्ट कैंसर’: व्याधि, कविता, स्त्री और स्त्रीवादी :https://samalochan.blogspot.com/2016/12/blog-post_14.html
३.अदम गोंडवी : जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
https://samalochan.blogspot.com/2016/10/blog-post_22.html
4. ‘गोदान’ से ‘मोहन दास’ तक किसानों की त्रासदी
https://samalochan.blogspot.com/2018/01/blog-post_8.html
5.ये ‘विद्रोही’ भी क्या तगड़ा कवि है !
https://samalochan.blogspot.com/2018/04/blog-post_6.html
6.मोनिका कुमार की कविताएँ : मार्क्स की मूँछ से बाल झड़ रहे हैं
https://samalochan.blogspot.com/2020/09/blog-post_3.html
७. अबाबील अम्बर से पुकार रहा है
https://samalochan.blogspot.com/2019/11/blog-post_6.html
8.छज्जे से झाँकती पृथ्वी
https://samalochan.blogspot.com/2020/05/blog-post_12.html
९.पृथ्वी के लिए शब्द
https://samalochan.blogspot.com/2017/06/blog-post_5.html

आदि आदि


{ Unknown } at: 20 दिसंबर 2020 को 2:03 am ने कहा…

अनुशंसा की विधा : आलोचना

• रचनाकार का नाम : संतोष अर्श

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

युवा कवि और आलोचक संतोष अर्श ने इधर अपने सुचिंतित आलेखों से ध्यान खींचा है. उनके अधिकतर आलेख समालोचन में मैंने पढ़े हैं. उनसे बहुत संभवनाएं हैं . मैं इस सम्मान के लिए उनका नाम प्रस्तावित करता हूँ.
__
उनके लेख
१. मुद्राराक्षस के नरक की नियतिहीनता : नारकीय :
https://samalochan.blogspot.com/2019/05/blog-post_15.html

२.'स्तन’ और ‘ब्रेस्ट कैंसर’: व्याधि, कविता, स्त्री और स्त्रीवादी :https://samalochan.blogspot.com/2016/12/blog-post_14.html
३.अदम गोंडवी : जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
https://samalochan.blogspot.com/2016/10/blog-post_22.html
4. ‘गोदान’ से ‘मोहन दास’ तक किसानों की त्रासदी
https://samalochan.blogspot.com/2018/01/blog-post_8.html
5.ये ‘विद्रोही’ भी क्या तगड़ा कवि है !
https://samalochan.blogspot.com/2018/04/blog-post_6.html
6.मोनिका कुमार की कविताएँ : मार्क्स की मूँछ से बाल झड़ रहे हैं
https://samalochan.blogspot.com/2020/09/blog-post_3.html
७. अबाबील अम्बर से पुकार रहा है
https://samalochan.blogspot.com/2019/11/blog-post_6.html
8.छज्जे से झाँकती पृथ्वी
https://samalochan.blogspot.com/2020/05/blog-post_12.html
९.पृथ्वी के लिए शब्द
https://samalochan.blogspot.com/2017/06/blog-post_5.html
मैं बहुत दूर से आया हूँ मैं बहुत देर तक रहूँगा
(वीरू सोनकर की कविताएँ)
http://www.merakipatrika.com/2020/05/blog-post_27.html?m=1

अनाम at: 20 दिसंबर 2020 को 2:04 am ने कहा…

अनुशंसा की विधा : आलोचना

• रचनाकार का नाम : संतोष अर्श

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

युवा कवि और आलोचक संतोष अर्श ने इधर अपने अत्यंत विवेकशील लेखन से आलोचना के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप किया है। अगोरा प्रकाशन से प्रकाशित जनकवि रमाशंकर यादव 'विद्रोही' के जीवन और रचनाकर्म पर आधारित उनकी संपादित पुस्तक 'विद्रोही होगा हमारा कवि' इन दिनों चर्चा में है। उनके बहुमुखी लेखन को पढ़ने के बाद मैं इस पुरस्कार के लिए उनका नाम प्रस्तावित करती हूँ।
__
उनके लेख
१. मुद्राराक्षस के नरक की नियतिहीनता : नारकीय :
https://samalochan.blogspot.com/2019/05/blog-post_15.html

२.'स्तन’ और ‘ब्रेस्ट कैंसर’: व्याधि, कविता, स्त्री और स्त्रीवादी :https://samalochan.blogspot.com/2016/12/blog-post_14.html
३.अदम गोंडवी : जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
https://samalochan.blogspot.com/2016/10/blog-post_22.html
4. ‘गोदान’ से ‘मोहन दास’ तक किसानों की त्रासदी
https://samalochan.blogspot.com/2018/01/blog-post_8.html
5.ये ‘विद्रोही’ भी क्या तगड़ा कवि है !
https://samalochan.blogspot.com/2018/04/blog-post_6.html
6.मोनिका कुमार की कविताएँ : मार्क्स की मूँछ से बाल झड़ रहे हैं
https://samalochan.blogspot.com/2020/09/blog-post_3.html
७. अबाबील अम्बर से पुकार रहा है
https://samalochan.blogspot.com/2019/11/blog-post_6.html
8.छज्जे से झाँकती पृथ्वी
https://samalochan.blogspot.com/2020/05/blog-post_12.html
९.पृथ्वी के लिए शब्द
https://samalochan.blogspot.com/2017/06/blog-post_5.html
मैं बहुत दूर से आया हूँ मैं बहुत देर तक रहूँगा
(वीरू सोनकर की कविताएँ)
http://www.merakipatrika.com/2020/05/blog-post_27.html?m=1

{ Jay Narayan } at: 21 दिसंबर 2020 को 7:45 pm ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
{ Jay Narayan } at: 21 दिसंबर 2020 को 7:57 pm ने कहा…

अनुशंसा की विधा : आलोचना

• रचनाकार का नाम : संतोष अर्श

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

युवा कवि और आलोचक संतोष अर्श ने इधर अपने सुचिंतित आलेखों से ध्यान खींचा है।सन्तोष अर्श जी के द्वारा रमाशंकर यादव'विद्रोही'के जीवन और रचनाकर्म पर सम्पादित पुस्तक'विद्रोही होगा हमारा कवि' इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है, यह पुस्तक बहुत ही उच्च कोटि की है, उनके द्वारा लिखे गए लगभग सभी आलेख मैं ने समालोचन पर पढ़े हैं.उनसे हिंदी साहित्य को बहुत सारी उम्मीदें और संभवनाएं हैं . मैं इस सम्मान के लिए उनका नाम प्रस्तावित करता हूँ.
__
उनके लेख
१. मुद्राराक्षस के नरक की नियतिहीनता : नारकीय :
https://samalochan.blogspot.com/2019/05/blog-post_15.html

२.'स्तन’ और ‘ब्रेस्ट कैंसर’: व्याधि, कविता, स्त्री और स्त्रीवादी :https://samalochan.blogspot.com/2016/12/blog-post_14.html
३.अदम गोंडवी : जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
https://samalochan.blogspot.com/2016/10/blog-post_22.html
4. ‘गोदान’ से ‘मोहन दास’ तक किसानों की त्रासदी
https://samalochan.blogspot.com/2018/01/blog-post_8.html
5.ये ‘विद्रोही’ भी क्या तगड़ा कवि है !
https://samalochan.blogspot.com/2018/04/blog-post_6.html
6.मोनिका कुमार की कविताएँ : मार्क्स की मूँछ से बाल झड़ रहे हैं
https://samalochan.blogspot.com/2020/09/blog-post_3.html
७. अबाबील अम्बर से पुकार रहा है
https://samalochan.blogspot.com/2019/11/blog-post_6.html
8.छज्जे से झाँकती पृथ्वी
https://samalochan.blogspot.com/2020/05/blog-post_12.html
९.पृथ्वी के लिए शब्द
https://samalochan.blogspot.com/2017/06/blog-post_5.html

आदि आदि

{ Jay Narayan } at: 21 दिसंबर 2020 को 8:01 pm ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
{ Mamta yadav } at: 21 दिसंबर 2020 को 8:20 pm ने कहा…

अनुशंसा की विधा : आलोचना

• रचनाकार का नाम : संतोष अर्श

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

हिंदी आलोचना के क्षेत्र में लगातार चर्चित हो रहे युवा कवि आलोचक संतोष अर्श का लेखन ,और उनकी आलोचकीय दृष्टि इन दिनों पाठकों का ध्यान आकर्षित कर रही है इसी क्रम में मैंने भी उनके कई लेख पढ़े हैं ,जिसमें उनके विचार सुगठित ,संयमित और विश्लेषण संतुलित रूप में दिखाई देता है उनकी भाषा बेहद आकर्षक तथा उनके लेखन कर्म में तेजस्विता और बौद्धिकता की झलक अपने बढ़ते क्रम में दिखाई दे रही है। अतः मैं आलोचना कर्म के सम्मान हेतु संतोष अर्श का नाम प्रस्तावित करती हूं ।

उनके लेख
१. मुद्राराक्षस के नरक की नियतिहीनता : नारकीय :
https://samalochan.blogspot.com/2019/05/blog-post_15.html

२.'स्तन’ और ‘ब्रेस्ट कैंसर’: व्याधि, कविता, स्त्री और स्त्रीवादी :https://samalochan.blogspot.com/2016/12/blog-post_14.html
३.अदम गोंडवी : जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
https://samalochan.blogspot.com/2016/10/blog-post_22.html
4. ‘गोदान’ से ‘मोहन दास’ तक किसानों की त्रासदी
https://samalochan.blogspot.com/2018/01/blog-post_8.html
5.ये ‘विद्रोही’ भी क्या तगड़ा कवि है !
https://samalochan.blogspot.com/2018/04/blog-post_6.html
6.मोनिका कुमार की कविताएँ : मार्क्स की मूँछ से बाल झड़ रहे हैं
https://samalochan.blogspot.com/2020/09/blog-post_3.html
७. अबाबील अम्बर से पुकार रहा है
https://samalochan.blogspot.com/2019/11/blog-post_6.html
8.छज्जे से झाँकती पृथ्वी
https://samalochan.blogspot.com/2020/05/blog-post_12.html
९.पृथ्वी के लिए शब्द
https://samalochan.blogspot.com/2017/06/blog-post_5.html
मैं बहुत दूर से आया हूँ मैं बहुत देर तक रहूँगा
(वीरू सोनकर की कविताएँ)
http://www.merakipatrika.com/2020/05/blog-post_27.html?m=1

{ hemant deolekar } at: 28 दिसंबर 2020 को 1:04 am ने कहा…


१. अनुशंसा की विधा : आलोचना

२. रचनाकार का नाम : सुदीप सोहनी

३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

४. रचना का नाम : 'इरफान: वो कैमरे में झाँक भर ले'

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना :मधुमती, मई 2020, https://www.rsaudr.org/show_artical.php?id=1376

६. अनुशंसा :

विश्व सिनेमा और भारतीय सिनेमा का निरंतर अवलोकन वह अध्ययन करने वाले सुदीप सोहनी मूलतः कवि हैं । एफटीआईआई से स्क्रीनप्ले राइटिंग का डिप्लोमा करने के उपरांत फिल्मों को देखने समझने की दृष्टि विकसित हुई और उन्होंने अपनी फिल्म लेखन यात्रा का आरंभ सिनेमा आलोचना/समीक्षा से किया। भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में नियमित कॉलम के ज़रिए उन्होंने देश दुनिया की प्रमुख फिल्मों, फिल्मकारों, अभिनेताओं, संगीतकारों, कथाकारों पर लिखा है। और विगत पाँच वर्षों से वे देश भर की पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, ब्लॉग्स, वेबसाइट्स के लिए लिख रहे हैं। 'इरफ़ान : वह कैमरे में झांक भर ले' आलेख की विशिष्ट बात यह लगती है कि वे इस आलेख का आरंभ प्रतिभा क्या है ? इस एकदम बुनियादी किंतु दार्शनिक प्रश्न से करते हैं। सुदीप नसीरुद्दीन शाह के मार्फत स्टेलर की उक्ति कोट करते हैं 'आपकी प्रतिभा आपके काम के चुनाव पर निर्भर करती है' । वे नसीर जी का उद्धरण भी पेश करते हैं 'अगर आप महान अभिनेता हैं और आपने कोई उल्लेखनीय यादगार फिल्म नहीं की तो आने वाली पीढ़ी के लिए आपको याद रख पाना असंभव है', इस बात को पुष्ट करते हुए सुदीप मार्लेन ब्रांडो का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं । सिनेमा और अभिनय के संदर्भ में सुदीप का चिंतन दार्शनिक स्तर पर चला जाता है जब प्रतिभा, चुनाव और अमिट छाप जैसे बिंदुओं पर मंथन करते नाटक और सिनेमा के मनीषियों के प्रसंग छेड़ते हुए इरफ़ान ख़ान जैसे परिपक्व अभिनेता की सृजन प्रक्रिया को समझने की ज़मीन तैयार करते हैं।इस आलेख में यह जानना दिलचस्प है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में इरफ़ान के सामने किस तरह अभिनय और उसके प्रशिक्षण का संसार खुला हुआ था, नाट्य विद्यालय से बाहर आने पर संघर्ष की शुरुआत और गुमनामी के दौर में अभिनेता का रियाज़ कैसा था। दूरदर्शन के धारावाहिक चंद्रकांता और शुरुआती फिल्मों के बाद जब वे विदेशी फिल्मों में नमूदार हुए तो उनके अभिनय की एक व्यापक रेंज दिखाई देने लगी। बहुत सहज ढंग की अदायगी और संवाद की शैली। इरफ़ान जिस भी फिल्म में दिखे वे ही वे दिखे।।जावेद अख्तर साहब हिंदी सिनेमा के गायकों के बारे में जब बातें करते हैं तो बरबस उनकी जुबान पर किशोर कुमार का नाम आता है वे कहते हैं कि किशोर के साथ कोई भी गाए, लेकिन किशोर आपको चुंबक की भांति खींच लेते हैं । ऐसा ही वशीकरण और सम्मोहन है इरफ़ान की शख्सियत और अदायगी में। सुदीप अभिनय के विभिन्न स्तरों की ओर इशारा करते हैं उनका मानना है कि सिनेमा का अभिनय स्कूल नहीं बल्कि सूक्ष्मा होता है यानी साइकोएनालिटिक अर्थात किरदार के मन में क्या चल रहा है उसका प्रकटीकरण। किंतु उसका द्रव्यमान क्या होगा इसका नियंत्रण भी अभिनेता के जिम्मे है।

सुदीप वैश्विक मान मानदंडों पर अभिनय के कुछ आधुनिक सिद्धांतों का जिक्र करना यहां ज़रूरी समझते है जैसे स्तानिस्लावस्की की मेथड एक्टिंग, साइकोएनालिटिकल अप्रोच, माइकल चेखव और ग्रोटोवस्की जैसे शिक्षकों की अभिनय पद्धति। इसके साथ ही सुदीप भारतीय नाट्य परंपरा का भी जिक्र करना महत्वपूर्ण समझते हैं 'भारतीय सिनेमा में रस सिद्धांत उसके नाटक से आया है'। इस आलेख में इरफान की अभिनय प्रतिभा को जितनी सूक्ष्मता से लेखक ने देखा वह महसूस किया है उतना ही उनके प्रेमी और जीवट स्वभाव को भी अभिव्यक्त किया गया है।

सुदीप के पूर्ववर्ती (और समकालीन भी) सिने समीक्षक और आलोचक प्रत्यक्ष रूप से सिनेमा या रंगमंच से नहीं आए थे, इसलिए उनकी भाषा में एक खास साहित्यिकता तो है पर कला और उसके माध्यम की सूक्ष्मता व तकनीकी पक्ष पर ज़ोर कम है। उनकी भाषा भी आम जनता में रुचि जगा नहीं पाती। सुदीप की समीक्षा की भाषा सरल है, रुचिकर है, जो आम पाठक या दर्शक को सम्मोहित करती है। उनके हर समीक्षात्मक आलेख में उनकी कवि - संवेदना प्रमुख रहती है अर्थात मानवीय आधार पर सिनेमा की पड़ताल, उसके पश्चात अन्य तकनीकी पहलुओं का आकलन।

सुदीप ने रंगकर्म जैसी सामूहिक कला को शिद्दत के साथ जीया है। नाटक लेखन और निर्देशन में सक्रिय सुदीप ने सुभद्रा, अमृता प्रीतम के जीवन पर आधारित अमृता, स्टोरी ऑफ एन अनटाइटल्ड कैनवास, रूमी, बाल नाटक न्यूटो और प्लूटो जैसे नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है । इस तरह थिएटर, साहित्य, संगीत उनके स्वभाव का अहम हिस्सा रहे हैं तथा समस्त कलाओं को देखने समझने की दृष्टि विकसित हुई। वे निरंतर कविता और फिल्म लेखन और निर्माण में सक्रिय हैं।

संस्तुतिकर्त्ता : हेमंत देवलेकर

{ Ambuj pandey } at: 29 दिसंबर 2020 को 6:45 am ने कहा…



1. अनुशंसा की विधा - आलोचना

2. रचनाकार का नाम - शुभनीत कौशिक

3. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस वर्ष से कम है ? हां (जन्म तिथि 11-12-1992)

4. रचना का नाम - "औपनिवेशिक भारत में हिंदी का विज्ञान-लेखन"

5. रचना के प्रकाशन संबंधी सूचना - प्रतिमान, जनवरी-जून 2020 (वर्ष 8, अंक 15)

6. अनुशंसा ~

उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब हिंदी अपने नये संस्कार ग्रहण कर रही थी और पत्र-पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार बढ़ रहा था, ठीक उसी समय हिंदी में विज्ञान-लेखन भी अपना आकार ले रहा था। खड़ी हिंदी ही इस विज्ञान लेखन का माध्यम बन रही थी। चूंकि विज्ञान-लेखन का यह नवाचार पश्चिम से आया था, फलतः अंग्रेजी के प्रभावस्वरूप उसकी कुछ रूढ़ियां भी विज्ञान-लेखन में संक्रमित हुईं। लेकिन देश में विज्ञान परिषदों और संस्थाओं के प्रादुर्भाव, जगह होने वाले आयोजनों से धीरे-धीरे हिंदी लेखकों ने इसे परिमार्जित किया। हिन्दी के समानांतर उर्दू के लेखक भी विज्ञान-लेखन की तरफ प्रवृत्त हो रहे थे। तो स्वाभाविक रूप से हिन्दी और उर्दू के बीच एक भाषाई तनाव और वैचारिक द्वन्द्व भी दिख रहा था।

भाषा की शुचिता, संप्रेषण और सशक्त व्याप्ति को लेकर भी लेखक समुदायों में मतैक्य नहीं था। कुछ विद्वान मान रहे थे कि अंग्रेजी और उर्दू सहित सभी भारतीय भाषाओं की शब्दावलियों का उनकी सामर्थ्य के मुताबिक इस्तेमाल किया जाय। जबकि कुछ लोगों की धारणा थी कि अंग्रेजी और उर्दू को तजकर अन्य भारतीय भाषाओं से तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावलियों का धड़ल्ले से प्रयोग किया जाना चाहिए।

विज्ञान-लेखन को लेकर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की प्रारंभिक वस्तुस्थिति क्या रही है, इस प्रवृत्ति की भरपूर पड़ताल है "औपनिवेशिक भारत में हिंदी का विज्ञान-लेखन"। इस महत्वपूर्ण पड़ताल में हम देख सकते हैं कि पूरे देश में विज्ञान को लेकर लोगों में कितनी उत्सुकता और उत्साह का माहौल था। उस कालखंड में भाषा और विज्ञान-लेखन को समर्पित ऐसे ढ़ेर से उदारमना लोग थे जो इस विधा के उन्नयन हेतु नाना प्रकार के उद्यम कर रहे थे। कुछ प्रत्यक्ष विज्ञान से जुड़े थे, कुछ अपनी रूचि के अनुकूल विज्ञान की तरफ उन्मुख हो रहे थे। कुछ पेशेवर विज्ञान-अध्यापक थे, तो कुछ वैज्ञानिक, और कुछ अनुसंधित्सु भी। ऐसे अनेक लोगों का महत्वपूर्ण विश्लेषण इस लेख में बड़े विस्तार से किया गया है।

विज्ञान-लेखन के शैशवावस्था में कैसे कुछ धार्मिक रूढ़ियां टूट रही थीं, और पौराणिक मान्यताएं खंडित हो रही थीं, यह भी देखना बड़ा रोचक है।

पनडुब्बी, परमाणु, रसायन, भौतिकी, हवाई जहाज, रेडियो, उपग्रह, मोटर गाड़ी, अंतरिक्ष विज्ञान, भूगोल, वनस्पति, आयुर्वेद, गणित, चिकित्सा-विज्ञान जैसे तमाम विषयों पर आम बोलचाल के साथ पारिभाषिक शब्दावलियों में विज्ञान-लेखन लोगों की जिज्ञसाओं का शमन कर रहा था और उन्हें विज्ञान की नित-नूतन जानकारियों और अनुसंधानों की जानकारी दे रहा था।

संस्तुति - अम्बुज पाण्डेय

{ RAMA SHANKER SINGH } at: 30 दिसंबर 2020 को 5:49 am ने कहा…

१ अनुशंसा की विधा : (आलोचना/ अनुवाद)

अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : अखिलेश सिंह


३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : (हाँ/नहीं)
हाँ

४. रचना का नाम : जॉयस मन्सूर की कविताएँ :
अनुवाद और प्रस्तुति

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना - पत्रिका का अंक, या वेब पत्रिका का लिंक :
https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/

६. अधिकतम एक हजार शब्दों में अनुशंसा - (सत्य, स्वातन्त्र्य, मूल्यबोध के आयामों पर रचना/आलेख/अनुवाद किस तरह खरी उतर रही है)

इस पुरस्कार के लिए अखिलेश का नाम दो कारणों से उचित होगा : कविता के साथ अनुवादक का बरताव और उसके संभव अर्थों को बचाए रखने की उसकी ईमानदार कोशिश. इन दोनों कामों में अनुवादक सफल रहा है. उसने नितांत मनोदैहिक सन्दर्भों को बड़ी खूबसूरती से अपने अनुवाद में ढाला है.

{ RAMA SHANKER SINGH } at: 30 दिसंबर 2020 को 10:02 pm ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
{ RAMA SHANKER SINGH } at: 30 दिसंबर 2020 को 10:04 pm ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
{ Unknown } at: 21 जनवरी 2021 को 8:58 am ने कहा…

सुन्दर अनुवाद। जीवन को गहरे तक स्पर्श करती आन की कविताओं को गार्गी ने बहुत सुन्दरता से हिन्दी के शब्दों में उतारा है। उनका कार्य सराहनीय है।

{ गुरु बनारसिया } at: 21 जनवरी 2021 को 9:21 am ने कहा…

अनुशंसा की विधा : अनुवाद

• रचनाकार का नाम : गार्गी मिश्र

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

• रचना का नाम : आन येदरलुंड की कविताएँ

• रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : https://www.sadaneera.com/poems-of-swedish-poet-ann-jaderlund-in-hindi-translation-by-gargi-mishra/

• संस्तुतिकर्त्ता : शेखर जायसवाल

{ महेश शुक्ला } at: 21 जनवरी 2021 को 10:15 am ने कहा…

गार्गी के अनुवाद की भाषा सहज और मर्मस्पर्शी है जिसमें भाषा की गहराई के साथ जीवन की गहराई भी छिपी हुई है।

{ Unknown } at: 21 जनवरी 2021 को 9:27 pm ने कहा…

• अनुशंसा की विधा : अनुवाद

• रचनाकार का नाम : आदित्य शुक्ल

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

• रचना का नाम : संघर्ष से कुछ उम्मीद मत करो, अगर मैं कहूं कि अब नहीं लिखूंगा, मेरी देह को भय होगा, मुझे नहीं

• रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना : https://www.sadaneera.com/poems-of-chilean-poet-roberto-bolano-in-hindi-translation-by-aditya-shukla/

http://www.sadaneera.com/prose-of-spanish-novelist-translated-in-hindi-by-aditya-shukla/

https://www.sadaneera.com/quotes-of-argentine-writer-jorge-luis-borges-translated-in-hindi-aditya-shukla/

• संस्तुतिकर्त्ता : अक्षय मलिक

{ Purnima } at: 22 जनवरी 2021 को 2:27 am ने कहा…

अनुशंसा की विधा : आलोचना

• रचनाकार का नाम : संतोष अर्श

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

युवा कवि और आलोचक संतोष अर्श का लेखन विविधतापूर्ण और रोचक है। वे युवाओं से लेकर वरिष्ठ लेखकों की रचनाओं पर टिप्पणी कर चुके हैं। कई शानदार हिन्दी लेखकों से उन्होंने लंबी और पठनीय बातचीत की है। वे तार्किकता के साथ आलोचना और भाषा के साथ सौंदर्यबोध को साधते हुए लिखते हैं। उनका लेखन इसका प्रमाण है। इधर उनकी संपादित पुस्तक 'विद्रोही होगा हमारा कवि' चर्चा में है। मैं आलोचना कर्म के लिए इस सम्मान हेतु उनका नाम प्रस्तावित करती हूँ।
__
उनके लेख
१. मुद्राराक्षस के नरक की नियतिहीनता : नारकीय :
https://samalochan.blogspot.com/2019/05/blog-post_15.html

२.'स्तन’ और ‘ब्रेस्ट कैंसर’: व्याधि, कविता, स्त्री और स्त्रीवादी :https://samalochan.blogspot.com/2016/12/blog-post_14.html
३.अदम गोंडवी : जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
https://samalochan.blogspot.com/2016/10/blog-post_22.html
4. ‘गोदान’ से ‘मोहन दास’ तक किसानों की त्रासदी
https://samalochan.blogspot.com/2018/01/blog-post_8.html
5.ये ‘विद्रोही’ भी क्या तगड़ा कवि है !
https://samalochan.blogspot.com/2018/04/blog-post_6.html
6.मोनिका कुमार की कविताएँ : मार्क्स की मूँछ से बाल झड़ रहे हैं
https://samalochan.blogspot.com/2020/09/blog-post_3.html
७. अबाबील अम्बर से पुकार रहा है
https://samalochan.blogspot.com/2019/11/blog-post_6.html
8.छज्जे से झाँकती पृथ्वी
https://samalochan.blogspot.com/2020/05/blog-post_12.html
९.पृथ्वी के लिए शब्द
https://samalochan.blogspot.com/2017/06/blog-post_5.html
मैं बहुत दूर से आया हूँ मैं बहुत देर तक रहूँगा
(वीरू सोनकर की कविताएँ)
http://www.merakipatrika.com/2020/05/blog-post_27.html?m=1

{ Veronika } at: 24 जनवरी 2021 को 12:15 am ने कहा…

अनुशंसा की विधा : आलोचना

• रचनाकार का नाम : संतोष अर्श

• रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : हाँ

युवा कवि और आलोचक संतोष अर्श ने इधर अपने अत्यंत विवेकशील लेखन से आलोचना के क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप किया है। अगोरा प्रकाशन से प्रकाशित जनकवि रमाशंकर यादव 'विद्रोही' के जीवन और रचनाकर्म पर आधारित उनकी संपादित पुस्तक 'विद्रोही होगा हमारा कवि' इन दिनों चर्चा में है।
हिन्दी के ख्यात लेखकों से उनकी बातचीत अनेक पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में पढ़ी गयी है।
उनके बहुमुखी लेखन को पढ़ने के बाद मैं इस पुरस्कार के लिए उनका नाम प्रस्तावित करती हूँ।
__
उनके लेख
१. मुद्राराक्षस के नरक की नियतिहीनता : नारकीय :
https://samalochan.blogspot.com/2019/05/blog-post_15.html

२.'स्तन’ और ‘ब्रेस्ट कैंसर’: व्याधि, कविता, स्त्री और स्त्रीवादी :https://samalochan.blogspot.com/2016/12/blog-post_14.html
३.अदम गोंडवी : जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से
https://samalochan.blogspot.com/2016/10/blog-post_22.html
4. ‘गोदान’ से ‘मोहन दास’ तक किसानों की त्रासदी
https://samalochan.blogspot.com/2018/01/blog-post_8.html
5.ये ‘विद्रोही’ भी क्या तगड़ा कवि है !
https://samalochan.blogspot.com/2018/04/blog-post_6.html
6.मोनिका कुमार की कविताएँ : मार्क्स की मूँछ से बाल झड़ रहे हैं
https://samalochan.blogspot.com/2020/09/blog-post_3.html
७. अबाबील अम्बर से पुकार रहा है
https://samalochan.blogspot.com/2019/11/blog-post_6.html
8.छज्जे से झाँकती पृथ्वी
https://samalochan.blogspot.com/2020/05/blog-post_12.html
९.पृथ्वी के लिए शब्द
https://samalochan.blogspot.com/2017/06/blog-post_5.html
मैं बहुत दूर से आया हूँ मैं बहुत देर तक रहूँगा
(वीरू सोनकर की कविताएँ)
http://www.merakipatrika.com/2020/05/blog-post_27.html?m=1

जवाब दें

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 4:46 am ने कहा…

Sudeep sohni

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 4:47 am ने कहा…

Sudeep sohni

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 4:48 am ने कहा…

सुदीप सोहनी

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 4:51 am ने कहा…

Sudeep sohni

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 5:15 am ने कहा…

Jay singhaniya

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 5:16 am ने कहा…

Kalpana roy

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 5:16 am ने कहा…

MIA KHALIFA

{ Pragati } at: 25 जनवरी 2021 को 7:21 am ने कहा…

Sudeep Sohni

{ Unknown } at: 25 जनवरी 2021 को 7:05 pm ने कहा…

Sudeep Sohni

{ Unknown } at: 30 जनवरी 2021 को 9:37 pm ने कहा…

१ अनुशंसा की विधा :

अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : अखिलेश सिंह


३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ?
हाँ

४. रचना का नाम : जॉयस मन्सूर की कविताएँ :
अनुवाद और प्रस्तुति

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना :
https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/

६. अधिकतम एक हजार शब्दों में अनुशंसा :

These translations should be welcomed as Hindi- incarnation of poetess. I read it at time of it's publication. I loved it.

{ Rahul meena } at: 4 फ़रवरी 2021 को 1:10 am ने कहा…

१ अनुशंसा की विधा :

अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : अखिलेश सिंह


३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ?
हाँ

४. रचना का नाम : जॉयस मन्सूर की कविताएँ :
अनुवाद और प्रस्तुति

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना :
https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/

६. अधिकतम एक हजार शब्दों में अनुशंसा :
I have read many poems mostly in English since there are not many psycho erotic works in hindi to my liking. But the translation done by Mr akhilesh is really good he has expressed the deprivation of sexual desire from the original work very beautifully.

{ bushan } at: 4 फ़रवरी 2021 को 4:03 am ने कहा…

१ अनुशंसा की विधा :

अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : अखिलेश सिंह


३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ?
हाँ

४. रचना का नाम : जॉयस मन्सूर की कविताएँ :
अनुवाद और प्रस्तुति

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना :
https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/

६. अधिकतम एक हजार शब्दों में अनुशंसा :
ये अनुवाद बहुत ही भावपूर्ण हैं और मूल रचना जैसे लग रहे हैं।
अनुवादक ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। इससे हिंदी में अच्छे काम-काज की वृद्धि होगी।
संस्तुतिकर्ता- विद्या भूषण कुमार

{ Priyanka Singh } at: 5 फ़रवरी 2021 को 7:48 am ने कहा…

अनुशंसा की विधा : (आलोचना/ अनुवाद)

अनुवाद

२. रचनाकार का नाम : अखिलेश सिंह


३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : (हाँ/नहीं)
हाँ

४. रचना का नाम : जॉयस मन्सूर की कविताएँ :
अनुवाद और प्रस्तुति

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना - पत्रिका का अंक, या वेब पत्रिका का लिंक :
https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/

६. अधिकतम एक हजार शब्दों में अनुशंसा:
जॉयस मन्सूर की कविताओं का अखिलेश सिंह जी द्वारा किया गया अनुवाद साहित्यिक अनुवाद की सभी कसौटियों पर खरा उतरता है। यह अनुवाद हिंदीभाषी पाठक को एक अद्भुत कवयित्री और उसकी बेहद साहसिक अभिव्यक्ति से परिचित करवाने के साथ-साथ हिंदी भाषा की सृजनात्मक क्षमता के नए आयामों को भी उद्घाटित करता है।

संस्तुतिकर्ता- प्रियंका सिंह

{ Tarushikha Sarvesh } at: 5 फ़रवरी 2021 को 10:01 am ने कहा…

संस्तुतियों का आरूप

१. अनुशंसा की विधा : (अनुवाद)

२. रचनाकार का नाम :अखिलेश सिंह

३. रचनाकार के रचना प्रकाशित होते समय उम्र चालीस से कम है ? : (हाँ)

४. रचना का नाम :जॉयस मंसूर की कविताएं:अनुवाद

५. रचना के प्रकाशन सम्बन्धी सूचना - वेब पत्रिका का लिंक :
https://www.sadaneera.com/poems-of-egyptian-french-poet-joyce-mansour-in-hindi-translation-by-akhilesh-singh/
६. अधिकतम एक हजार शब्दों में अनुशंसा -

मूल रचना में जो भाव है, उसके बेहद करीब है अखिलेश जी के अनुवाद। ऐसा लगता है कि अखिलेश जी ने लेखिका की भावनाओं को आत्मसात करके उनकी रचनाओं को अनुदित किया है। जॉयस की रचनाएं पाठक को विचलित करती हैं और क्षणों एवं भावनाओं की जटिलताओं और उलझनों से अवगत कराती हैं। अखिलेश जी के अनुवाद के जरिए भी पाठक को ऐसा ही महसूस होता है। बहुत ही सरलता के साथ अखिलेश जी ने मूल कविताओं की गहराई को अनुवाद के माध्यम से हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाया है। यह एक बहुत अहम योगदान है।
संस्तुतिकर्ता-
डॉ तरुशिखा सर्वेश
अस्सिस्टेंट प्रोफेसर, समाज शास्त्र
सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़।

 

समालोचन वेब पत्रिका

2021 : विष्णु खरे स्मृति सम्मान : आलोचना और अनुवाद

2021 में यह सम्मान आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र मे 2018 , 19 , 20 तक प्रकाशित रचनाओं को प्रदान किया जाएगा.

चयन में आपका स्वागत है