खुले में रचना : ४ :

7/04/2012



खुले में रचना : ४ :
जयपुर
१६ जून २०१२
हिंदी ग्रंथ अकेदमी,
झालाना इंडस्ट्रियल एरिया
जयपुर, राजस्थान





जैसी कि 'खुले में रचना' की परम्परा रही है तीन कवि अथवा तीन साहित्यकार अपनी रचनाओं को सीधा पाठकों के सामने रखते हैं ..और फिर उन पर खुलकर विमर्श होता है. इस बार हिंदी की तीन ई-पत्रिकाएं : 'समालोचन' के साथ अरुण देव, 'आपका साथ साथ फूलों का' के साथ अपर्णा मनोज जी और 'साहित्य दर्शन' के साथ रमेश खत्री जी. आधे घंटे देर से शुरू हुए इस कार्यक्रम कि अध्यक्षता की हिंदी ग्रन्थ अकादमी जयपुर के निदेशक  डा. आर. डी. सैनी ने और संचालन का दायित्व संभाला सईद अयूब जी ने. शुरुआत किया अपर्णा मनोज जी ने अपनी पत्रिका 'आपका साथ साथ फूलों का' से कि कैसे उनके दिमाग में इस बात का विचार आया, कैसे उन्होंने  इसे एक ब्लॉग के रूप में कार्यान्वित किया,  एक स्तरीय ब्लोग को चलाने में किन किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, कैसे अच्छे रचनाकारों की जब रचनाएँ आने लगी तो माहौल उत्सव धर्मी हो जाता है. इत्यादि.  

रमेश खत्री जी ने अपनी ई-पत्रिका 'साहित्य दर्शन' के परिचय के साथ -साथ ये भी अवगत कराया कि कैसे उनकी पत्रिका हिंदी की  हर विधा का प्रतिनिधित्व करती है चाहे वो कविता हो गद्य हो निबंध लेखन हो उपन्यास हो अथवा डायरी हो. रमेश खत्री जी ने  कुछ तकनीकी समस्याओं/पहलुओं की तरफ भी सबका ध्यान खींचा.  

अंतिम प्रस्तुति रही हिंदी की ख्यातिप्राप्त ई पत्रिका 'समालोचन'. डा. अरुण देव ने शुरुआत हिंदी पत्रिकाओं के इतिहास से करते हुए 'सरस्वती' पत्रिका का जिक्र किया कैसे आचार्य महावीर  प्रसाद द्विवेदी  ने साहित्यिक पत्रिकाओं के लिया मानदंड स्थापित किये कैसे उस समय कोई साहित्यकार तब तक साहित्यकार नहीं माना जाता था जब तक वह 'सरस्वती' में छपा न हो हिंदी साहित्य की लगभग हर स्तरीय पत्रिका को छूते हुए डा.देव ने इन पत्रिकाओं के इतिहास पर संक्षिप्त प्रकाश डाला और आज की पत्रिकाओं मसलन 'तदभव' और 'हंस' और 'आलोचना' जैसी  पत्रिकाओं के समक्ष वो 'समालोचन' को कहाँ खड़ा पाते हैं और इन पत्रिकाओं से भी उन्हें क्या कुछ सीखने को मिला इस बात का भी जिक्र किया. डा. अरुण देव ने  ई-पत्रिकाओं का भविष्य, उनकी सर्वग्राह्यता, उनके सामने चुनौतियों को भी अपने सारगर्भित वक्तव्य में स्थान दिया.

अब बारी थी प्रश्नोत्तर काल की और पहले प्रश्न का सामना भी अपर्णा मनोज जी ने ही किया सईद अयूब जी के एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने अपना अनुभव कुछ यूँ बांटा कि जैसे माँ बच्चे को संभालती है वैसे ही ब्लॉग की देखभाल करनी पड़ती है ...मगर सत्र के सबसे सरल सवाल और सबसे जटिल जबाब की बारी आयी तो सामने थे रमेश खत्री जी सवाल था क्या भविष्य देखते हैं आप इन वेब पत्रिकाओं का और उन्होंने कह दिया कि हमारे हिसाब से प्रिंटेड पुस्तकों का भविष्य  अब नहीं हैं  अधिकतम २५ वर्षों में पुस्तकें समाप्त हो जाएँगी और उनकी जगह ई-बुक्स ले लेंगी. सभागार में शायद किसी को इस जबाब की  उम्मीद नहीं थी खासकर इस समय सीमा की ..और विरोध भी जयपुर से ही हुआ. श्री गोविंद माथुर जी  ने संयत किन्तु दृढ शब्दों में कहा कि मैं  मानता हूँ कि ई-साहित्य या ई-बुक  भविष्य की  विधा है मगर जितना आसानी मुझे हाथ में किताब लेकर पढ़ने में होती है उतना समय मैं कम्पूटर के सामने नहीं बैठ सकता और उन्होंने ने यह कहते हुए श्री खत्री जी की बात से अपनी असहमति जताई कि पुस्तकें कभी खतम नहीं होंगी !  

चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए डा. लक्ष्मी शर्मा  ने निम्न मध्यम वर्ग और गरीब तबके के सरोकारों को चर्चा के केंद्र में जगह दी. आधारभूत ढाँचा बिजली, कम्पूटर  और इन तक उस तबके की पहुँच का जिक्र करते हुए डा.शर्मा ने मौजूदा व्यवस्था में रहकर पूरी तरह से ई लरनिंग या ई रीडिंग कि संभावनाओं को ख़ारिज कर दिया.

अपर्णा मनोज जी ने  अपने गुजरात के अनुभवों के आधार पर ई-स्कूलिंग  का उदाहरण देकर ये साबित करने का प्रयत्न किया कि आने वाला भविष्य अब ई-युग ही है ...मगर स्थानीय साहित्य और सुधी समाज इतनी दूर दृष्टि के लिए अपने मानस को तैयार करता हुआ नहीं दिखा !    

चर्चा में एक बार फिर उस समय बहुत गहनता और उर्जा आ गयी जब आदेश संत (शायद) के एक सवाल के जबाब में  और डा. लक्ष्मी शर्मा और गोंविद माथुर की टिप्पड़ियों को ध्यान में रखते हुए डा. अरुण देव ने कहा कि साहित्य केवल मध्यमवर्ग ही पढ़ता है ...उच्च वर्ग के पास साहित्य के लिए समय नहीं है औए निम्नवर्ग के पास साहित्य के लिए साधन और समय दोनों नहीं हैं और फिर इस क्रम से हटकर  उन्होंने सभा का ध्यान इस ओर खींचा कि कैसे पहली किताब छपी होगी उसके पहले तो सारा साहित्य ही स्मरण और श्रुति पर आधारित था परिवर्तन आते हैं परिवर्तन आयेंगे अब कोई विधा लुप्त नहीं होने जा रही है और ई-साहित्य के इस आने वाले युग में भी छपी हुई किताबों का महत्त्व बरकरार रहेगा.

प्रेमचंद गाँधी जी ने चर्चा को बहुत ही रोचक मोड़ दिया जब उन्होंने यह कहा कि जब आप एक किताब को इंटरनेट पर डाउन लोड करके पढ़ते हैं तो आप निश्चित रूप से  एक पेड़ को बचाते हैं.  उनकी इस अकाट्य बात का जबाब किसी के भी पास नहीं था  और कहीं से कुछ जबाब आता भी तो उससे  पहले सभागार में उपस्थित जयपुर दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और प्रख्यात साहित्यकार  श्री नंद भारद्वाज जी ने अपने सधे हुए वक्तव्य से यह रेखांकित कर दिया कि प्रिंट साहित्य और ई-साहित्य एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं वरन  दोनों एक दूसरे के साथ ही हैं  हाँ आने वाला  समय पाठक को जरूर और अधिक विकल्प मुहैया कर रहा है.

सत्र का समापन डा. आर. डी. सैनी के अध्यक्षीय भाषण से हुआ जिसमें डा. सैनी कि चिंताओं का केंद्रबिंदु  बना लेखक जिसके बारे में अभी तक किसी ने नहीं सोंचा था चूँकि ई-साहित्य लगभग मुक्त और मुफ़्त होता है ऐसे में लेखक के हकों का उसकी जरूरतों को आवाज़ दिया डा. सैनी ने और सीधे सवाल किया कि मुफ़्त लिखकर मुफ़्त प्रकाशित करते रहने से हम खायेंगे क्या ..और इस एक सवाल के साथ ही सभा का विसर्जन हुआ.

मध्यांतर हमेशा ही कुछ ना कुछ स्वल्पाहार लिए आता है  और एक बहुत ही गरमागरम बहस के बाद तो वह और भी प्रिय लगने लगता है मध्यांतर भी और स्वल्पाहार भी !  

बहरहाल दूसरा सत्र और जिस सत्र के लिए मैं विशेष रूप से दिल्ली  से गया था  'कविता पाठ' का उसका भी आगाज़ हुआ  और इस बार अध्यक्षता का दायित्व संभाला श्री नंद भारद्वाज जी ने  और कार्यक्रम की  बागडोर (संचालन) संभाली हम सबके जाने पहचाने प्रिय कवि और साहित्यकार मायामृग जी ने. शुरुआत किया उदयपुर से पधारे और अपना पहला कविता पाठ कर रहें राजकुमार व्यास जी ने और अपने पहले ही कविता पाठ से उन्होंने ने सबका दिल जीत लिया ...उसके बाद अनीता आर्य जी ने भी  अपनी एक कविता पढ़ी और फिर प्रधान सेनापति की तरफ सबका ध्यान गया जी हाँ मैं प्रिय भाई चंडीदत्त शुक्ल जी की ही बात कर रहा हूँ जहाँ प्रेम की बात करनी हो वहाँ बिना चंडीदत्त जी के वह चर्चा अधूरी ही रहेगी खैर यहाँ कविताओं की बात   क्या कवितायेँ थी 'कालीबंगा' और 'अगर हम होते उँगलियाँ एक हाथ की' दोनों बेजोड़. उसके बाद रमेश खत्री जी का मोहक कविता पाठ श्रोताओं को बहुत प्रिय लगा .

अब बारी थी खाकसार की यानी मेरा नाम पुकार लिया गया खैर सभाध्यक्ष से अनुमति पाकर मैंने भी अपनी तीन ग़ज़लें पढ़ीं पहली "पता ही नहीं चला" दूसरी 'उसे रब न कहूँ तो भी' जो मेरी सबसे अद्यतन गज़ल थी और तीसरी और अंतिम  'आ जिंदगी तू आज मेरा कर हिसाब कर' इसके बाद  सुधीर सोनी जी की दो कवितायेँ एक में ५ भाव चित्र और एक अन्य कविता श्रोताओं द्वारा काफी सराही गयी.  गोविंद माथुर की अनुभवी लेखनी से निकली सरल बयानी वाली अति असाधारण कविताओं ने भी सभा पर गज़ब का असर किया.  

मेरे लिए प्रेमचंद गाँधी जी को सुनना सच में किसी उपलब्धि से कम नहीं है ...कविता में ईमानदारी को आवाज लगाती उनकी कविता 'कुविचार'.  अहा कितना सच है अगर हम यह मानलें की कुविचार भी एक हकीकत हैं  सु और कु की अवधारणाओं  पर करारा प्रहार करती हुई कविता.

अब एक बार फिर हम सुन रहें थे गुजरात से पधारी कवियत्री अपर्णा मनोज जी को अगर मैं यह कहूँ कि गुजरात की पीड़ा गुजरात का दर्द उनकी कविताओं में अपना मूर्त रूप पता है तो अतिश्योक्ति न होगी 'परज़ानिया' सीरीज़ की अपनी दो कविताओं से सभा में सन्नाटा बुन दिया अपर्णा जी ने .

एक बार फिर जोरदार स्वागत हुआ से प्रथम सत्र के नायक डा. अरुण देव जी का. पहली कविता 'मीर' जो मशहूर शायर मीर तकी मीर की गज़लों के कुछ अंश और बेहद शानदार भावो से सजी थी ने सबका ध्यान बरबस अपनी ओर आकृष्ट किया तो दूसरी कविता "मेरे अंदर की स्त्री" में पुरुष और नारी के सबंधों की पड़ताल एक बिकुल नए ही रूप में की गयी थी 'हम आश्वस्त थे कि उस तरफ तो तुम हो ही' और मैं अपने अंदर की उस आधी स्त्री को ढूंढ रहा हूँ वाकयी लाजबाब थी  और तीसरी कविता 'एकांत' डा. देव के गहन लेखन और और वैचारिक धरातल को दर्शा गयी तीनों कवितायेँ एक से बढ़कर एक.

आयोजक सईद अयूब जी ने अपनी दो लाजबाब कवितायेँ सुनायीं जिसे उन्होंने सभा में आये सभी लोगों को समर्पित करके सुनायी "दाल में नमक की तरह ना थोड़ा कम ना थोड़ा ज्यादा " और "अचानक आयी बरसात में किसी दुकान के छज्जे की तरह"  हम सबको बताकर सभा की और सभी की वाहवाही लूटी. और फिर अंत में मायामृग जी ने अपनी दो कवितायेँ सुनायी वाह क्या आवाज़ है जैसा संचालन वैसी ही धमक काव्यपाठ में अभी सालों तक आपकी आवाज़ गूंजती रहेगी कान में मायामृग जी . इस अवसर पर मैं भी उपस्थित रहा ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है.        

सबसे अंत में श्री नंद भारद्वाज जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण के रूप में अपनी दो कवितायेँ सुनायीं पहली बच्चों के सहज प्रश्नों को  और दूसरी स्त्री के प्रश्नों को  प्रतिनिधत्व देती हुई कवितायेँ  सच में बेजोड़ थीं .          

और इस तरह से समापन हुआ उस एक बहुत ही खूब सूरत शाम का जो आने वाले कई वर्षों तक बार बार आकर स्मृतियों में चुपके से बैठ जाया करेगी और हम बार बार उन मधुर पलों में डूब जाया करेंगे.    

'नोट :- मित्रों बहुत से नाम मुझसे छूट गए हैं और बहुत सी कवितायेँ और वक्तव्य भी मगर यकीन मानिये अगर मुझे ये ख्याल भी आया होता कि मैं इस कार्यक्रम को इस तरह प्रस्तुत करूँगा तो ऐसी गलती हरगिज़ ना होती ...यह रिपोर्ट स्मृतियों पर ही आधारित है ...इस लिए सुधी पाठक इसे समझेंगे और मेरी गलतियों की ओर ध्यान नहीं देंगें.









आनन्द द्विवेदी


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