हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' का लोकार्पण समारोह

11/26/2012

अरे यायावर रहेगा याद
हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' के लोकार्पण समारोह की एक रपट वाया नई दिल्ली

    

दिल्ली में जबकि मौसम सर्द होने लगा है, कुछ लोग अस्तर लगे हुए कोट पहनने लगे हैं और कुछ लोगों ने अस्त्राखान की बनी हुयी कश्मीरी टोपियाँ निकाल ली हैं या उन्हें कश्मीर से मंगवाने के बारे में विचार करने लगे हैं, यह जानकर आश्चर्यमिश्रित सुखद अहसास हुआ कि कोट के अस्तर और अस्त्राखानी टोपियों का सम्बन्ध रूस में वोल्गा के किनारे बसे हुए उस शहर के नाम से है जिसे अस्त्राखान के नाम से जाना जाता है और जहाँ कई सदी पूर्व भारत से हिंदू व्यापारी पहुँचे थे. और भी कई रोचक, ज्ञानवर्धक बातों का पता चला किंतु इन बातों के पता चलने के अलावा भी वहाँ बहुत कुछ था. वहाँ जबकि बाहर का मौसम ठंडा होने लगा था, एक ऊष्मा, ऊर्जा, ओज और आनंद से भरा हुआ माहौल था. आम तौर पर जबकि पुस्तकों का लोकार्पण समारोह एक रस्म बन कर रह जाता है और आने वाले लोगों की अधिक रूचि कार्यक्रम के जल्दी समाप्त होने में रहती है, प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की नयी कृति यात्रा-संस्मरण ‘हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' का लोकार्पण समारोह एक अत्यंत ही सफल साहित्यिक आयोजन सिद्ध हुआ.
दिनाँक 25 नवंबर 2012, दिन रविवार को शाम 5:30 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में राजकमल प्रकाशन द्वारा आयोजित हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' का लोकार्पण समारोह आरंभ हुआ. पुस्तक का लोकार्पण डॉ. कर्ण सिंह के हाथों सम्पन्न हुआ जबकि मुख्य वक्ता के रूप में देवीप्रसाद त्रिपाठी, ओम थानवी और सुश्री मन्नू मित्तल जी ने अपने वक्तव्य दिए. मुख्य वक्ता के रूप में अशोक वाजपेयी जी का नाम भी था किंतु किसी कारणवश वे नहीं आ सके. कार्यक्रम का सफल एवं कुशल संचालन रवीन्द्र त्रिपाठी जी ने किया. समारोह स्थल पर कितने लोग आए इसका अंदाज़ा आनंद कुमार शुक्ल के इस वक्तव्य से लगता है: “उपलब्ध कुर्सियों से अधिक मेहमानों के आ जाने के कारण कुछ सम्मानित आगंतुकों को बैठने में परेशानी हुई. इस कारण थोड़ी गहमा-गहमी रही. फिर भी, कार्यक्रम अत्यंत सुरुचिपूर्ण और विद्वत माहौल में संपन्न हुआ.”
डॉ. कर्ण सिंह जी द्वारा पुस्तक के लोकार्पण के बाद लेखकीय वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने जब हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' लिखने का मन बनाया तभी से उनके जेहन में यह बात थी कि हिंदी में आम तौर पर लिखे जाने वाले यात्रा संस्मरणों की पद्धति का वे पालन नहीं करेंगे. एक ऐसी पद्धति जिसमें यह सूचना दी जाती है कि फला दिन को यात्रा का कार्यक्रम बना, फला दिन मैं दूतावास में गया और कितनी दिक्कतों के बाद मुझे वीजा की प्राप्ति हुई, फिर मैंने टिकट लिया और फिर मैं वहाँ गया आदि-आदि, असल में यात्रा वृत्तांत के नाम पर कुछ भी लिख देने भर की चाहत का नाम है. एक अच्छा यात्रा वृत्तांत वह है जिसमें यात्री उस जगह की साँस्कृतिक, सामाजिक और साहित्यिक सक्रियता, चेतना और संपन्नता को न केवल वर्तमान संबंध में बल्कि दूर अतीत के परिप्रेक्ष्य में भी देखे, अनुभव करे और उसका विस्तार से वर्णन करे साथ ही अपने देश के साँस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक आदि संदर्भों से उसकी भिन्नता-अभिन्नता का भी बहुत निर्मम तरीके से अन्वेषण करे. उन्होंने अस्त्राखान से अपने संबंधों के बारे में बोलते हुए कहा कि बहुत पहले शायद बचपन में मैंने अस्त्राखान के बारे में पंडित नेहरु को पढ़ा था जिसमें अस्त्राखान और वहाँ के हिंदू व्यापारियों और हिंदी सराय का वर्णन था पर बात कहीं विस्मृत हो चुकी थी. सितंबर 2011 में मुझे एक सेमिनार में येरेवान जाने का अवसर प्राप्त हुआ और मैंने सोचा कि क्यों न इस अवसर का सदुपयोग करते हुए अस्त्राखान की यात्रा भी की जाए. और इस सोच को अमली जामा पहनाते हुए मैंने ऑफिस से तीन दिन की छुट्टी ली और अस्त्राखान वाया येरेवान जा पहुँचा. उन्होंने आगे कहा कि यह पुस्तक कई मूलभूत चिंताओं का प्रतिफल है. सात दिन की अपनी अस्त्राखान और येरेवान की यात्रा के दौरान कई मिथ टूटे, बहुत सी नयी बातें ज्ञात हुईं, बहुत सारे अंधविश्वास समाप्त हुए और इन सबने मिलकर इस पुस्तक का रूप ग्रहण किया. उन्होंने अस्त्राखान के हिंदू व्यापारियों का ज़िक्र करते हुए कहा कि वहाँ के व्यापारी मूलतः हिंदू थे जो मारवाड़, पंजाब व गुजरात से वहाँ पहुँचे थे. एक और महत्वपूर्ण बात जो प्रोफेसर अग्रवाल ने कही कि भारत को जड़ समाज बताना ही प्रगतिशीलता का पर्याय हो गया है और भारतीय समुद्र पार की यात्रा को पाप मानते थे. इस अवधारणा को सिरे से खारिज करते हुए इसे औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि से प्रेरित बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय दूर देशों की यात्रा करते थे, इसके स्‍पष्‍ट प्रमाण हैं.


प्रोफेसर अग्रवाल ने अपने संबोधन में कवि चारेंत्स (जिनका वर्णन पुस्तक में भी है) का ख़ास तौर पर ज़िक्र करते हुए एक बहुत मार्के की बात कही कि अस्त्राखान और येरेवान में कई सड़को के नाम वहाँ के प्रमुख साहित्यकारों के नाम पर हैं जबकि भारत की राजधानी दिल्ली में मुंशी प्रेमचंद के नाम पर कोई सड़क नहीं है. कवि चेरेंत्स की कुछ रचनाओं का हिंदी अनुवाद पेश करते हुए प्रोफ़ेसर अग्रवाल ने अपनी लोकार्पित पुस्तक के कुछ अंश भी पढ़ कर सुनाये. उनमें वह अंश भी शामिल था जिसमें लौटते समय की हवाई यात्रा के दौरान बिजनेस क्लास में और वह भी अकेला मुसाफिर होने की घबराहट, एयर होस्टेस से घबराते हुए वाइन माँगना और वाइन सर्व करते हुए दुर्घटनावश एयर होस्टेस के सर पर लगी चोट और एक मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत प्रोफेसर अग्रवाल के हाथों का उसके सर को सहलाना...इस प्रसंग के पाठ ने जहाँ सभा में हास्य का पुट घोला, वहीं सबको प्रोफ़ेसर अग्रवाल के मानवीय रूप के अलावा उस रूप का भी पता चला जिसका परिचय उनके फेसबुक मित्रों को पिछले कुछ वर्षों से धीरे-धीरे हो रहा है...उनका कवि रूप. गद्य में सुंदर पद्य की भाषा कैसे लिखी जा सकती है, इसका शानदार नमूना है वह अंश. बाद में विद्वान वक्ताओं ने पुरुषोत्तम जी के इस प्रसंग का मज़ा भी लिया और उनके मानवीय रूप और पद्यात्मक गद्य भाषा की जमकर तारीफ़ भी की.

प्रोफेसर अग्रवाल के बाद पहले वक्ता के रूप में जे.एन.यू. में रशियन स्टडीज की प्रोफ़ेसर सुश्री मन्नू मित्तल जी ने हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' के लोकार्पण पर प्रोफेसर अग्रवाल को बधाई देते हुए येरेवान की अपनी यात्रा को याद किया और कहा कि विश्व पटल पर भारतीयों की भूमिका प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रही है. मध्य एशिया के देशों के साथ भारत का वैचारिक और साँस्कृतिक आदान-प्रदान कई शताब्दियों से रहा है. सदियों पुराने बने मंदिरों और ऐतिहासिक स्थलों को बनाने में भारतीय कारीगरों का बहुत बड़ा योगदान रहा है पर पाश्चात्य जगत ने अपने इतिहास में इस योगदान को जगह न देकर, इस पर एक पर्दा गिरा रखा है. उन्होंने आगे कहा कि सिल्क रूट केवल ईस्ट-वेस्ट नहीं था बल्कि एक साउथ-नार्थ सिल्क रूट भी था और इस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है. सुश्री मित्तल ने कहा कि जे.एन.यू. के वाइस चांसलर ने एक ‘सिल्क रूट स्टडी सेंटर’ बनाए जाने का समर्थन किया है और जब भी यह स्टडी सेंटर कायम होता है और जब भी एक ‘सिल्क रूट लाइब्रेरी’ बनेगी, पुरुषोत्तम अग्रवाल की और उनकी इस पुस्तक की वहाँ अत्यंत आवश्यकता होगी. साथ ही हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान'  में किये गए तमाम तरह के अन्वेषणों खासकर भाषा संबंधी अन्वेषणों का भी उन्होंने वर्णन किया.

दूसरे वक्ता के रूप में जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने पुरुषोत्तम अग्रवाल की इस बात से सहमति जताते हुए कि यात्रा संस्मरण केवल कुछ जानकारियों को साझा करने का नाम भर नहीं है, कहा कि एक यात्रा संस्मरण वास्तव में एक समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक, साँस्कृतिक, वैचारिक अन्वेषण करने वाला वह इतिहास होता है जिसे एक साहित्यकार ही लिख सकता है और उन्हें खुशी है कि उपरोक्त सभी पहलुओं से लैस यह यात्रा संस्मरण प्रोफेसर अग्रवाल जैसे साहित्यकार ने लिखा है. प्रोफ़ेसर अग्रवाल ने अपने संबोधन में ओम थानवी जी के पुस्तक अंश पढ़ने के उद्देश्य पर यह कहकर रोक लगाई थी कि यह काम उनका है पर ओम थानवी जी ने कहा कि पुस्तक अंश पढ़ना उनकी ज़िद है और अपने ज़िद पर कायम रहते हुए उन्होंने पुस्तक के कुछ अंशों का पाठ किया और पुस्तक के समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक, साँस्कृतिक, वैचारिक पक्षों को श्रोताओं के सामने रखा. उन्होंने बताया कि किस तरह से यह संस्मरण भाषा के प्रति लेखक की चिंता और फिर उसके अन्वेषण को दिखाता है. श्री थानवी ने कहा कि जब एक लेखक अपनी पुस्तक में किसी बात का ज़िक्र करता है तो वह पाठकों को और बहुत से लेखकों और घटनाओं की याद दिलाता है. प्रोफ़ेसर अग्रवाल की पुस्तक में अस्त्राखान और येरेवान के नगरों और महलों के निर्माण में लगे मजदूरों में से किसी का कहीं उल्लेख न होने के दुखद वर्णन को याद करते हुए ओम थानवी जी ने कहा कि उन्हें यह अंश पढ़ते हुए अज्ञेय की एक कविता याद आ गई.

जो पुल बनाएंगे
अवश्य ही पीछे रह जाएंगे
सेनाएं हो जाएंगी पार
जयी होंगे राम
मारे जाएंगे रावण
जो निर्माता रहे
इतिहास में बंदर कहलाएंगे. (अज्ञेय)

उन्होंने पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा गाँधी जी का ससम्मान अपनी पुस्तक में उल्लेख करने पर बधाई देते हुए कहा कि यह दिखाता है कि बहुत सारे प्रगतिशीलों की तरह प्रोफेसर अग्रवाल प्रगतिशीलता का अंध अनुसरण नहीं करते हैं, अपितु उपलब्ध साक्ष्यों और अपने विवेक के आधार पर अतीत का पुनर्मूल्यांकन करते हैं. अंत में उन्होंने एक बहुत ही मार्के की बात कही कि “हिंदी सराय की यात्रा सरस गद्य में अतीत का साँस्कृतिक संधान है.”

सांसद व लेखक देवीप्रसाद त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत यह कहते हुए की कि उन्हें जो जो कहना था वह उनके पूर्व के वक्ताओं ने कह दिया है. किंतु इस वाक्य के बाद इस यात्रा संस्मरण के बारे में कई स्थापनाएँ देते हुए अपने सम्मोहित कर देने वाले अंदाज़ में श्री त्रिपाठी ने श्री अग्रवाल के इस काम की भूरी-भूरी प्रशंसा की. उन्होंने पुस्तक की भाषा का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक प्रवाहमान गद्य में लिखी गयी है. उन्होंने प्रोफ़ेसर अग्रवाल की सहज-सरल और प्रवाहमय भाषा की तारीफ़ करते हुए पुस्तक के कई वाक्यों को उद्धरित भी किया. उन्होंने कहा कि यह केवल एक यात्रा संस्मरण भर नहीं है अपितु इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र, व अर्थशास्त्र का संगुफन है. सात अध्यायों में लिखी गई यह पुस्तक देखने में छोटी ज़रूर है पर अपनी पहचान में बड़ी है. हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' को उन्होंने समाजशास्त्रीय समझ के साथ लिखा गया ऐतिहासिक लेखन बताते हुए उसे न केवल यात्रा संस्मरण की विधा की, न केवल हिंदी साहित्य की अपितु पूरे साहित्य की एक अति महत्वपूर्ण कृति करार दिया. अंत में उन्होंने हास्य की मुद्रा में  कहा कि वे महत्वपूर्ण साहित्य उसे मानते हैं जो गद्य, पद्य और मद्य तीनों में लिखी जाए और प्रोफेसर अग्रवाल की पुस्तक इन तीनों को अपने अंदर समेटती है. यह कहते हुए उन्होंने हिन्दी सराय...’ के गद्य, उसमें सम्मिलित कवि चेरेंत्स की कविताओं के साथ अन्य कविताओं का ज़िक्र और वापसी की यात्रा में एयर होस्टेस से वाइन माँगने की घटना की ओर इशारा किया.
    
और अंत में डॉ. कर्ण सिंह ने अपने संक्षिप्त संबोधन में पूरी ईमानदारी से और अफ़सोस करते हुए यह स्वीकार किया कि संसद की व्यस्तता के कारण वे पुस्तक को पढ़ नहीं सके पर जैसा कि अन्य वक्ताओं ने इस पुस्तक के बारे में कहा उससे उनकी जिज्ञासा चरम पर पहुँच गयी है और वे जल्द ही इस पुस्तक का अध्ययन करेंगे. यात्रा संस्मरणों की बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें यात्राएँ बहुत पसंद हैं और उनके बारे में पढ़ना भी. उन्होंने इस पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कहा कि प्राचीन भारत कोई जड़बद्ध समाज नहीं था जैसा कि आमतौर पर मान लिया जाता है. भारत की प्राचीन संस्कृति और वैचारिक संपन्नता का विश्व के कई देश न केवल आदर करते थे बल्कि उसका लोहा भी मानते थे. कम्बोडिया, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा आदि कई मध्य एशिया के देशों के मंदिर और वास्तु कला आज भी भारत की विकसित साँस्कृतिक और वैचारिक संपन्नता को दर्शाते हैं. यद्यपि ब्रिटिश शासन के औनिवेशवादी मानिसकता ने इस संपन्नता को काफ़ी नुकसान पहुँचाया और यह एक प्रकार से दब सा गया पर आज इसे फिर से लोगों के सामने लाने की आवश्यकता है और पुरुषोत्तम अग्रवाल की यह पुस्तक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है.


उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न स्थानों और देशों की यात्रा से बुद्धि और ज्ञान का विकास होता है. नए-नए लोगों से होने वाली मुलाकातें, नई-नई संस्कृतियों से रूबरू होना और यात्रा में आने वाली कठिन परिस्थितियाँ व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं. पुस्तक में एक स्पष्ट नक्शा न होने की कमी की तरफ़ इशारा करते हुए अंत में डॉ. कर्ण सिंह ने हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' में सम्मिलित किये गए चित्रों और विभिन्न विषयों की प्रशंसा करते हुए ज़ोर देकर कहा कि इस महत्वपूर्ण पुस्तक का यथाशीघ्र अग्रेज़ी में अनुवाद होना चाहिय.    
    

पूरा लोकार्पण समारोह कैसा था इसकी एक बानगी समारोह में शामिल कवियित्री रूपा सिंह के फेसबुक पर की गई एक टिप्पणी से मिलती है. उन्होंने (रोमन लिपि) में लिखा है:

“जैसे यात्रा के विविध पड़ाव होते हैं....पूरी मजलिस...कई दौर से गुज़रती रही...पॉलिटिक्स, हिस्ट्री, कल्चर, फ़ूड,...गद्य..पद्य...की गंभीरता के साथ....संजोयी..मीठी रसीली यादों की चुटकियाँ....एक रंग-रास-वैविध्य भरी यात्रा.....अरे यायावर रहेगा याद....”







सईद अय्यूब  

 

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