जिज्ञासा और प्रतिलिपि का आयोजन

10/09/2011

विपिन चौधरी


जिज्ञासा मंच और प्रतिलिपि बुक्स का सयुंक्त प्रयास.अपने प्रिय लेखकों  से रूबरू सवालात और जबाब. अपने आप मे एक महत्वपूर्ण घटना है.लेखकों की रचना प्रक्रिया को जानना एक अलग तरह का अनुभव देता है, और यह अनुभव बखूबी प्रदान किया "जिज्ञासा मंच और प्रतिलिपि प्रकाशन" ने. देश की राजधानी में तमाम तरह के साहित्यिक आयोजन होते रहते  हैं. कुछ आयोजन अपनी समाप्ति के साथ ही जहन से विलुप्त हो जाते है,परन्तु ७ अक्टूबर २०११  को संपन्न हुए  जिज्ञासा और प्रतिलिपि के सयुंक्त प्रयास से आयोजित यह कार्यक्रम लम्बे समय तक याद करने वाला है. इस कार्यक्रम में प्रतिलिपि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकों प्रभात रंजन की बोलेरो क्लास, मनोज रूपड़ा की टावर ऑफ़ साईलेंस और मार्केज़ के जीवन और लेखन पर आधारित प्रभात रंजन द्वारा लिखित पुस्तक मार्केज़ की कहानी पर चर्चा हुई.

कार्यक्रम का संचालन प्रतिलिपि प्रकाशन के गिरिराज किराडू ने किया.कार्यक्रम की शुरुआत में जिज्ञासा मंच की गतिविधियों के बारे में प्रकाश डालते हुए सुमन केसरी अग्रवाल ने बताया कि ...कुछ अरसे पहले मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास "शिगाफ" पर जिज्ञासा ने गोष्ठी आयोजित करवाई थी और आज की इस गोष्ठी  में कुछ उपेक्षाकृत युवा और नए लोगों को इन साहित्यिक पुस्तकों पर चर्चा करने का मौका दिया जा रहा है..

आज के आलोचकों की दिक्कतों और उपनिवेशवाद की स्मृतियों पर बोलते हुए कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रसिद्ध आलोचक विचारक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा "कोई भी कृति पहले लोकल होती है,और फिर ग्लोबल. आज की आलोचना में मूल पाठ छोड़ कर सब कुछ होता है बस मूल पाठ का ही जिक्र नहीं होता .रेनू का उपन्यास ग्लोबल नहीं था.  जादुई यथार्थवाद हमारे आज के समाज और अपने घर मे ही देखने को मिल जाता है. . उन्होने इस बात पर चिंता व्यक्त  करते हुए कहा की दिक्कत इस बात की है कि समकालीन लेखन ने औपनिवेशिक स्मृतियाँ मिटा दी हैं और हमारे यहाँ के लेखक को कालिदास भी तभी याद आते है जब उन का जिक्र कोई विदेशी करता है.. ब्रिटिश भारत में अकाल जानबूझकर पैदा किया गया जिससे कि अंग्रेजों को  सस्ते लेबर मिल जाएँ ..और विचित्र यह है कि इस क्रूरता और इस तरह कि हिंसा की याद भी मिटती जा रही है. हम इस तरह रहते हैं जैसे कभी यह  देश  उपनिवेश रहा ही न हो. 

युवा कवि अरुण देव ने प्रख्यात स्पेनिश लेखक "मार्केज़" के जीवन और लेखन पर आधारित कथाकार प्रभात रंजन द्वारा लिखित पुस्तक मार्केज़ की कहानी पर चर्चा करते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण किताब है जिसमें प्रभात ने उनके जीवन में आई औरतों पर  एक अध्याय ही लिखा है.अपने वक्तव्य मे उन्होंने एक मार्के की बात कही कि यह सोचने की बात है की एक महान पत्रकार होते हुये भी मार्केज ने अपने लेखन में भारत  का कही कोई जिक्र नहीं किया, जबकि उनकी रचनाशीलता  और  भारत के आजादी का  संघर्ष एक ही समय में घटित हो रहे थे. और वह जबकि एक पत्रकार भी थे.

अरुण देव ने जादुई यथार्थवाद के मसीहा मार्केज़ के जीवन के तिलिस्म पर बोलते हुए कहा कि हमारे लिये मार्केज़ के लेखन के अलावा यह भी जादुई यथार्थ है कि कैसे एक लेखक अपने जीते जी किवदंती बन जाता है और उसका जन्मदिन एक उत्सव की तरह मनाया जाता है और हिंदी के लिए यह भी चकित करने वाली चीज है कि एक लेखक ६ देशों में अलग अलग बंगले रखता हो.

युवा कवयित्री  विपिन चौधरी ने प्रभात रंजन के कहानी संग्रह "बोलेरो क्लास"पर बोलते हुए कहा कि इस संग्रह की कहानियों में आज के इन्सान के धैर्य चुकने का अंतर्नाद ,है जो देर तक प्रतिध्वनित होता रहता है और यही  गूँज इस संग्रह की सफलता है.

इसके अतिरिक्त राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय ने अनुवाद की तकनीक और उसकी उपयोगिता पर सारगर्भित वक्तव्य दिया और विनयकान्त मिश्र ने मनोज रुपङा की कहानी संग्रह "टावर ऑफ़ साईलैंस" की तीन लंबी कहानियों पर अपनी रोचक टिप्पणियाँ दी.

गौरतलब यह है की प्रतिलिपि का सरोकार देश विदेश के साहित्य को उस ऊंचाई  पर ले जाने का है जो आज के हिंदी संस्थानों की स्वार्थता के कारण अब तक नहीं पहुँच पाया है. युवा लेखकों और प्रतिलिपि प्रकाशन जैसे संस्थानों के सयुंक्त प्रयास से यह संभव हो सकता है.

कार्यक्रम के अन्त में प्रभात रंजन और मनोज रूपड़ा से श्रोताओं ने उनकी रचनाशीलता पर दिलचस्प सवाल किए. जिनके जबाब भी कम दिलचस्प नहीं थे.. गोष्ठी में मनीषा कुलश्रेष्ठ, सैयद अयूब और बड़ी संख्या में सुधी श्रोताओं की उपस्थिति रही. 

























 

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